पिता की इच्छा से चुनी संस्कृत, प्रेम के चलते बढ़े आगे, पद्मश्री प्रो. वेम्पटि कुटुम्ब की कहान
प्राचीन ज्ञान परपरा के संरक्षक प्रोफेसर वेम्पटि कुटुम्ब शास्त्री को आज जिस भाषा ज्ञान के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया है, वह उनका खुद का चुनाव नहीं था बल्कि उनके पिता की इच्छा से उन्होंने संस्कृत पढ़ना शुरू किया था. हालांकि वेम्पटि कहते हैं, शुरुआत 10 साल की उम्र में पिता की वजह से हुई लेकिन संस्कृत को आगे जारी मैंने इसलिए रखा क्योंकि इस भाषा से मुझे प्रेम हो गया था. मेरी मां हमेशा भक्ति और धार्मिक गीत गाती थीं. आगे चलकर मेरे गुरुओं ने मेरा मार्गदर्शन किया और फिर मैंने संस्कृत का अध्ययन जारी रखा. प्रोफेसर शास्त्री की उपलब्धियां वैश्विक स्तर पर हैं. राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय को डीम्ड यूनिवर्सिटी बनाने का श्रेय भी इन्हें जाता है. इसके अलावा इन्होंने नई पीढ़ियों को संस्कृत से प्रेम करना सिखाया. प्रोफेसर कहते हैं कि आप वही विषय पढ़िए, जिससे आपको प्रेम हो, अगर सीखने में आनंद लेंगे तो सफलता निश्चित है. इस वीडियो में जानते हैं कि कैसे संसाधनों के अभाव में पढ़ा एक छात्र आगे चलकर भारत के विराट ज्ञान भंडार का संरक्षक बना?