User:Gourav Kumar Mahato
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तीसरा दोष : "कवि ने कहीं कहीं प्रसिद्धि का त्याग भी किया है। जैसे - कैलासादिवासी व्योमकेश - सुनती हूँ मैं - शक्ति संग बैठे कर श्रेष्ठ स्वर्णासन पै - यहाँ शिव के लिए 'स्वर्णासन' प्रसिद्धि - विरुद्ध है।"{{सही}}{{cite book |last1=कृष्णदत्त |first1=पालीवाल |title=मैथिलीशरण गुप्त ग्रंथावली (भाग-10) |date=2008 |publisher=वाणी प्रकाशन |location=नई दिल्ली |isbn=8181437551 |page=27}} |
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चौथा दोष : " 'मेघनाद - वध' के कवि बहुत ही उच्छृंखल प्रकृति के थे। वरूणानी के बदले उन्हें वारुणी पद अच्छा मालूम हुआ। उन्होंने वरुण की पत्नी के अर्थ में उसी का प्रयोग कर दिया। जो शब्द कन्या के अर्थ में प्रयुक्त होना चाहिए उसे पत्नी के अर्थ में प्रयुक्त करना उच्छृंखलता की चरम सीमा है! अनुवादक की इतनी हिम्मत न हो सकी।"{{cite book |last1=कृष्णदत्त |first1=पालीवाल |title=मैथिलीशरण गुप्त ग्रंथावली (भाग-10) |date=2008 |publisher=वाणी प्रकाशन |location=नई दिल्ली |isbn=8181437551 |page=24 |edition=pratham}} |
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इन दोषों के अतिरिक्त गुप्त जी ने रसदोष, अनुचित वर्णन, अनावश्यक दोष आदि का भी रेखांकन 'मेघनाद - वध' की भूमिका में किया है। |
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गुप्त जी अनुवाद में मर्यादा का विशेष ध्यान रखते हैं। उनके शब्दों में उनकी मर्यादावादी दृष्टि को हम देख सकते हैं। "लक्ष्मी के लिए 'केशव - वासना' और सीता के लिए 'राघव वांछा' पदों का प्रयोग कवि ने किया है। अनुवाद में इसकी जगह 'केशव की कामना' और 'राम कामना' कर दिया गया है।"{{cite book |last1=कृष्णदत्त |first1=पालीवाल |title=मैथिलीशरण गुप्त ग्रंथावली (भाग-10) |date=2008 |publisher=वाणी प्रकाशन |location=नई दिल |isbn=8181437551 |page=29,30}} |
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गुप्त जी कविता के अनुवाद में छन्द को विशेष महत्व देते हैं। 'मेघनाद - वध' का अनुवाद उन्होंने मात्रिक छन्द में की है जिसमें प्रत्येक पंक्ति में 15 अक्षर हैं। काव्य सर्जना में छन्दों का विशेष महत्व होता है। छन्द कविता के भाव को भी प्रभावित करते हैं। अनुवाद में छंदों की आग्रहता के प्रभाव को हम अनुवादक के ही शब्दों में देख सकते हैं - "छंद के अनुरोध से यदि कवि के ही प्रयुक्त किए शब्द नहीं आ सके हैं तो उसके बदले ऐसे पर्याय रखे गए हैं जिससे रचना का सौन्दर्य न बिगड़ने पावे। जैसे कवि ने यदि लक्ष्मी को 'पुण्डरीकाक्षवक्षोवासिनी' कहा है और वह वैसा का वैसा अनुवाद के छंद में न आ सका तो उसके बदले 'विष्णुवक्षोवासिनी' कहकर तीनों वकारादि शब्दों का प्रयोग किया गया है।"{{cite book |last1=कृष्णदत्त |first1=पालीवाल |title=मैथिलीशरण गुप्त ग्रंथावली (भाग-10) |date=2008 |publisher=वाणी प्रकाशन |location=नई दिल्ली |isbn=8181437551 |page=30 |edition=प्रथम}} |
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द्विवेदीयुगीन कविता की प्रमुख प्रवृत्ति रही है - इतिवृत्तात्मकता। गुप्त जी द्वारा किया गया 'मेघनाद-वध' का अनुवाद इतिवृत्तात्मक शैली में किया गया अनुवाद है। जिस प्रकार की कृति (मूल) 'मेघनाद-वध' है उसका अनुवाद वैसा नहीं है। इसे एक उदाहरण द्वारा समझ सकते हैं - |
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मूल :उदेन आदित्य जबै उदय अचले| नादिल गम्भीरे रक्षः हेरी रक्षोनाथे। |
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अनुवाद : होता है उदित वह! देख रक्षोराज को रक्षोगण गरजा गंभीर धीर नाद से। |
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=== निष्कर्ष : === |
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मैथिलीशरण गुप्त की अनुवाद दृष्टि पर विचार करने के पश्चात निम्न बातें सामने आई जिसे हम बिन्दुवार देख सकते हैं - |
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1.) मैथिलीशरण गुप्त की अनुवाद दृष्टि पर उनके साहित्यिक दृष्टि - सुधारवादी दृष्टि - का गहरा प्रभाव है। |
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2.) उनके द्वारा किए गए अनुवाद में रचनात्मकता का अभाव है। |
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अनुवाद के लिए वह भावानुवाद के पक्षधर हैं परन्तु उनका अनुवाद एक भाषा के विचार को दूसरे भाषा में पहुँचाने तक ही सीमित रह जाता है वह भी वहाँ तक जहाँ तक उनके शुद्धतावादी विचारों की रक्षा हो सके। |
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3.) गुप्त काव्य-सृजना के लिए मित्राक्षर को आवश्यक नहीं मानते। |
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4.) जिस तरह की सौन्दर्यपरक कृति का अनुवाद मैथिलीशरण गुप्त करते हैं वैसा सौन्दर्य उनके द्वारा अनुदित पाठ में नहीं आ पाता। |
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इसके निम्न कारण हो सकते हैं - |
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छन्द के प्रति विशेष आग्रहता |
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बंगला भाषा एवं खड़ी बोली का संरचनात्मक भेद |
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'मेघनाद-वध' स्वच्छन्दतावादी प्रवृति की रचना है जिसका अभाव गुप्त जी की साहित्यिक दृष्टि में है। |
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5.) गुप्त जी की साहित्यिक एवं अनुवाद दृष्टि शास्त्रीयतानुमोदित है। यहाँ शास्त्रीयता से तात्पर्य नियमबद्धता से है। |
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